ये नाम नहीं, पहचान है - पार्ट 4 (झक्की आया...)

ये शायद साल 1997 या 98 की बात है। सतपुड़ा की लंबी बरसातें ख़त्म हो चली थीं और मौसम थोड़ी उमस लिए हुए था। उस रोज़ शाम के कोई 6 या साढ़े 6 बजे होंगे, जब हम लोग क्लब कॉलोनी की एक क्रिकेट टीम से 15-16 ओवर्स का मैच मुश्किल से जीतने के बाद ख़ुशी मना रहे थें। शर्त के पैसे मिल चुके थें, मगर पैसों से ज़्यादा तसल्ली हारी हुई टीम को चिढ़ाने में मिल रही थी। उस मैच के दौरान दोनों ही टीमों के बीच काफी बहस और गहमा गहमी हुई थी और करीब-करीब झगड़ा होते हुए बचा था। आख़िर में विजेता साबित होने से लड़कों को कुछ ज़्यादा ही मज़ा मिल गया था और उसका जश्न भी खूब मनाया गया। शाम के ढलते तक हमारी टीम के कुछ ख़िलाड़ी पैदल तो कुछ अपनी सायकल लिए घर की तरफ निकल चुके थें। वहां सिर्फ मैं और राजेश बचे हुए थें और आख़िर में किट चेक करने के बाद हम भी निकलने की तैयारी में थें। दूसरी टीम के ज़्यादातर लड़के मैदान के दूसरे हिस्से में खड़े हुए कुछ बात कर रहे थें। राजेश और मैं घर जाने के लिए निकलें कि तभी उनमें से किसी ने राजेश को कुछ कहा। मुझे ठीक से तो याद नहीं.. पर हाँ, उसे बंगाली कहते हुए कोई गाली दी थी। गाली सुनते ही राजेश ने सायकल रोकी और हम दोनों उन लोगों की तरफ बढ़ें... मैंने देखा कि वो पूरी की पूरी टीम थें और हम सिर्फ दो लोग। राजेश और उनके बीच कहासुनी बढ़ गई और बात हाथापाई तक पहुँचने ही वाली थी कि तभी उनमें से किसी ने कहा - "अबे भागो.. झक्की आया.. झक्की आया।" अचानक वो सारे लोग अपना घेरा तोड़कर कुछ ही सेकण्ड्स में तितर बितर हो गएं और वहां से घर की ओर भागने लगे। हमने देखा कि जंगल की तरफ से हाथ में बड़ा सा डंडा लिए झक्की दौड़ा चला आ रहा था और उसके हम तक पहुँचने से पहले वो सभी लड़के वहां से बड़ी तेज़ी से खिसक लिए थें। वो पूरा सीन किसी साउथ इंडियन फिल्म जैसा था जिसमें एक अकेले हीरो के आते ही सारे विलेन भाग खड़े होते हैं। लड़कों का एक पूरा झुण्ड जिस लड़के से ख़ौफ़ खाकर भाग गया था वो लड़का कोई और नहीं बल्कि हमारी ही टीम से खेलने वाला अनिल वटके था। अनिल वटके उर्फ़ झक्की के बारे में कुछ भी कहना सनक और पागलपन की बढ़ाई करना ही होगा, मगर कुछ लोग या यूँ कहे कुछ किरदार इतने दिलचस्प होते हैं कि उनकी बातें, उनकी हरकतें उम्र भर याद आती है और जब भी याद आती है हमेशा गुदगुदाती है। मेरे ब्लॉक से कोई तीन ब्लॉक पीछे बने क्वार्टर्स में अनिल अपने माँ-बाप और बड़े भाई के साथ रहता था। कहते हैं उसकी सनकी तबियत और अजीब हरक़तों से त्रस्त लोगों ने उसका नाम झक्की रख दिया था। झक्की मतलब ऐसा आदमी जिसके दिमाग़ और धुन का कोई ठिकाना नहीं था और वो क्यों, कब और कहाँ कोई पागलपन कर दें ये अंदाजा भी लगाना मुश्किल था। मुझे याद है कि एक प्रैक्टिस मैच के दौरान मुझसे कैच ड्राप हो गया था और जब मैं वापिस अपनी पोजीशन पर लौट रहा था तो तभी मेरी पीठ पर एक ईंट आकर लगी थी। वो मार इतनी जोर की थी कि मैं उसी वक़्त ज़मीन पर गिर पड़ा और अपनी सांस खींचने के लिए भी संघर्ष करने लगा। ये बताने कि ज़रूरत नहीं कि वो ईंट मुझे झक्की ने ही मारी थी। आला दर्जे के जंगली और कमअक्ल लड़के रहे झक्की के हमारी टीम का हिस्सा बनने से पहले के कई किस्से हैं जिनमें से कुछ तो इलाके में भी बेहद मशहूर हुए थें। इनमें सबसे मशहूर किस्सा झक्की और उसके मोहल्ले में रहने वाले पंजाबी परिवार के लड़कों के बीच की दुश्मनी का है। झक्की की हरक़तों से गुस्सा होकर उन भाइयों ने एक रात बिजली कटौती के दौरान उसे पकड़ा और बाहर पड़ी रेत में गर्दन तक दफ़ना दिया था। जनवरी की भारी ठण्ड में झक्की रातभर उसी रेत में दफ़न रहा मगर कोई उसे ढूंढ नहीं पाया। अगली सुबह जब उस तरफ टहलने निकले कुछ लोगों की नज़र उस पर पड़ी तो उसे बाहर निकाला गया। मैंने कभी झक्की से ही उसका ये किस्सा सुना था। अपने ऊपर हुए हमले का बदला लेने के लिए झक्की रात-दिन मौके की तलाश में रहने लगा। आखिर कुछ दिनों बाद उसे बड़ा अच्छा मौका भी मिल गया। हमारे क्वार्टर्स के पीछे रेलवे लाइन क्रॉस करते ही जंगल शुरू हो जाता है और जंगल में ही थोड़ा आगे जाकर एक मैदान बनाया हुआ था जहाँ कई लोग क्रिकेट खेला करते थें। उस रोज़ सरदार भाइयों में से एक भाई क्रिकेट मैच खेलने उसी ग्राउंड पर पहुंचा। झक्की को जैसे ही ख़बर मिली वो भी उसके पीछे-पीछे वहां पहुँच गया। मैच ख़त्म हुआ तो उस लड़के ने वहीँ कहीं पर एक पेड़ के नीचे अपना बल्ला रखा और एक डाली से लटककर झूला झूलने लगा। तभी अचानक झक्की कहीं से निकला और उसने नीचे पड़ा बल्ला उठाया और पेड़ से लटक रहे लड़के की कमर पर पूरी ताक़त से दे मारा। वो चीखते हुए धड़ाम से नीचे गिरा और झक्की वहाँ से भाग लिया। उसके बाद कई हफ़्तों तक झक्की अपने घर नहीं गया था जबकि चोट खाने वाले उस लड़के ने अपनी कमर पर पट्टा बांधकर वो लंबा वक़्त गुज़ारा था। झक्की भाई का एक और किस्सा भी है जो उन दिनों बहुत पॉपुलर हुआ करता था। हमारे यहाँ बारिश के बाद काली मिट्टी बहुत गीली हो जाया करती है। शायद इसी वजह से एक निहायत ही गंवई खेल घुपानी या गपानी की शुरुआत हुई होगी। इसमें एक लड़का लोहे की रॉड को ज़मीन की तरफ इस तरह मारता है कि वो वहां पड़ते ही अंदर धंस जाए। उसके बाद वो उस रॉड निकालकर उसे फिर आगे की ज़मीन पर मारता है। इस तरह ये सिलसिला तब तक चलता है, जब तक कि वो रॉड ज़मीन में धंसने से इंकार न कर दे। जहाँ रॉड गिरी समझो पहले लड़के की बारी ख़त्म मगर असली चैलेंज तो वहीँ से शुरू होता है। दुसरे लड़के को वहां से अपने एक ही पैर पर चलते-उछलते ख़ेल शुरू होने वाली जगह तक वापिस जाना पड़ता है। अगर बीच में कहीं दूसरा पैर ज़मीन पर टिकाया तो उसे फिर वही लंगड़ दौड़ दुबारा से करनी होती थी। ये ख़ेल बच्चों को बड़ा मज़ा देता था खासकर इसे देखने वालों को मुफ़्त में मनोरंजन मिलता।
ऐसे ही एक रोज़ झक्की ने रॉड को अपने मोहल्ले के बीच से ज़मीन पर मारना शुरू किया और उसके पीछे दूसरा ख़िलाड़ी इसी उम्मीद में चला कि रॉड जल्द ही कहीं गिर जाए और वो अपने हिस्से की लंगड़ दौड़ पूरी कर खाना खाने के लिए घर जाएगा। लेकिन वो बेचारा ये नहीं जानता था कि वो दिन उस पर कितना भारी गुज़रने वाला है। झक्की ने रॉड ज़मीन पर मारना शुरू किया। उसके हाथ से जैसे ही रॉड छूटती तो घप्प की आवाज़ के साथ गीली ज़मीन में गहरी धंसती जाती। उसका निशाना इतना पक्का था कि रॉड का ऊपरी हिस्सा आसमान की तरफ एकदम सीधा खड़ा होता था। अपने मोहल्ले को आराम से पार कर झक्की सड़क तक आया। फिर वहां से दूसरे मोहल्ले से होता हुआ रेलवे लाइन की तरफ बढ़ा। उसका अचूक निशाना देखकर और भी लड़के उसके पीछे जमा होने लगे और उसी के साथ में चलने लगे। किसी ऊबड़-खाबड़ जगह पर पहुँचते ही उस दूसरे ख़िलाड़ी को लगता कि अब रॉड गिर जायेगी, लेकिन झक्की अपने हाथ का कमाल दिखाकर रॉड को ज़मीन में गाढ़ ही देता। जैसे ही उसने रॉड रेलवे ट्रैक पर घुसाई उस दूसरे बन्दे की मानो हालत टाइट हो गयी। पत्थरों से भरे हुए रेलवे ट्रैक पर एक पैर से चलते हुए वापिस जाना बहुत मुश्किल काम था। ट्रैक के नीचे एक बेहद गहरी ढलान थी जो उसके टास्क को लगभग नामुमकिन बना देती। इतना सोचते ही उसका चेहरा उतरने लगा लेकिन अभी तो ख़ेल लंबा चलना था। झक्की गपानी ख़ेल का सचिन तेंदुलकर था और वो किसी भी कीमत पर अपनी पारी ख़त्म नहीं करना चाहता था। उसने रेलवे लाइन पर पड़े पत्थरों के बीच भी रॉड को ज़मीन में धँसाना जारी रखा और आगे बढ़ता गया। दोपहर हो चुकी थी और सूरज सिर पर तन गया था। दूसरे ख़िलाड़ी का भूख से हाल बेहाल था और साथ चल रहे तमाशबीन भी उनको और आगे जाते देख ख़ुद घर की तरफ लौटने लगे थे। आख़िर में तो वो और झक्की ही बचे जो ट्रैक पर आगे बढ़े जा रहे थें। सुनने में आया था कि झक्की उस रॉड को धंसाते-धंसाते घोड़ाडोंगरी तक ले गया था। उस मोहल्ले से घोड़ाडोंगरी 14 किलोमीटर दूर है। हमारे यहाँ किसी की कमअक्ली को बताने के लिए कहावत है कि "भाई उससे बात करना और घोड़ाडोंगरी पैदल जाना बराबर है।" ऐसे में ये यकीन करना मुश्किल है कि वो दोनों वहां तक गए ही होंगे मगर उनके साथ जो लड़के थे उन्होंने झक्की को सलैया तक रॉड मारते और आगे बढ़ते हुए देखा था। ऐसे में हो सकता है कि झक्की थोड़ा और आगे तक चला गया होगा। फिर भी ये मानना होगा कि वो दूरी बहुत ज़्यादा थी और वहां तक बिना गिरे रॉड गाढ़ते बढ़ना एक कारनामे जैसा ही था।
ख़ैर पैदल चलते-चलते थक जाने से शायद झक्की का ध्यान भटक गया और वो रॉड एक पत्थर पर मार बैठा। इस बार वो ज़मीन में घुस नहीं पाई और आवाज़ के साथ नीचे लुढ़क गई। झक्की ने रॉड अपने हाथ में उठाई और उस बन्दे से लंगड़ चलने के लिए कहा। बेचारा वो पहले से ही हैरान था उस पर झक्की का खौफ ऐसा कि बिना टास्क पूरा किये छुटकारा मिलना मुमकिन नहीं था। उसने वहीँ बैठकर रोना शुरू कर दिया। ख़ुद झक्की भी थक चुका था और जानता था कि वो बहुत दूर तक आ गया है। उस रोज़ झक्की की मोटी अक्ल पर पता नहीं कौन से देवता का आशीर्वाद पड़ा की उसके अंदर का इंसान जाग गया और उसने दूसरे ख़िलाड़ी की जान बख़्स दी। सामने वाले ग़रीब ने राहत की सांस ली और वो दोनों एक साथ वापिस घर की तरफ लौट पड़े। सोचने वाली बात ये है कि अगर झक्की अपनी सनक और पागलपन पर अड़ जाता तो उस बेचारी जान का क्या हश्र होता। वो मासूम करीब-करीब 4 किमी के पत्थरों से भरे रेलवे ट्रैक, 25 फ़ीट की सीधी ढलान और ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर लंगड़ चलने का टास्क पूरा करते-करते दुनिया ही छोड़ चुका होता। झक्की जैसी शख़्सियत कोई रोज़-रोज़ आपकी ज़िन्दगी में नहीं आती। मैं ये कह सकता हूँ कि हमारे साथ खेलते हुए उसमें बहुत से बदलाव हुए। बात-बात पर लड़ने-झगड़ने की उसकी आदत में सुधार हुआ और वो ज़्यादा वक़्त हम लोगों के साथ गुज़ारने लगा। उसके अंदर एक छुपा हुआ टैलेंट भी था। एक रोज़ मैंने उसे अपने क्वार्टर के साइड में बनी बाड़ को बिना किसी सहारे के एक झटके में कूदकर पर करते देखा लिया तो मेरे कहने पर उसने बार-बार वो करतब करके भी दिखाया। बता दूं कि उस बाड़ की ऊंचाई कम से कम 5 फ़ीट तो रही ही होगी। एक रोज़ मैंने उससे पूछा कि "यार तू अपनी ही मस्ती में लगा रहता है ज़रा ये तो बता की तेरा लड़कियों को लेकर क्या सोचना है?" झक्की मेरे उस सवाल पर मुस्कुराया और बोला कि उसे अक्सर एक बड़ा ज़बरदस्त सपना आता है। मैंने पूछा कौन सा सपना तो उसने बताना शुरू किया कि वो हमेशा सपने में देखता है "शाम का वक़्त है और इस मोहल्ले में बिजली कटौती के दौरान सब लोग बाहर बैठे हुए हैं। लड़के चौराहे पर खड़े होकर बातें कर रहे हैं और लड़कियां इधर से उधर झुण्ड बनाकर टहल रही हैं। सब कुछ नॉर्मल है कि तभी अचानक पीछे जंगल से एक शेर निकलकर इस तरफ आता है और लोगों पर हमला करना शुरू कर देता है। नोंचता-खसोटता वो इस गली में आता है और उसे देखते ही तुम सारे दोस्त यहाँ से तुरंत भाग खड़े होते हो। बेचारी सब लड़कियां चिल्ला चोट करने लगती है और शेर उनके सामने पहुँच जाता है। तभी मैं आता हूँ... शेर और लड़कियों के बीच में जाकर शेर से लड़ने लगता हूँ। लड़कियां घबराकर एक-दूसरे से लिपट जाती हैं और तुम लोग अपने घर की खिड़कियों में से शेर और मेरी फाइट देख रहे होते हो। आख़िर में उस शेर को मैं मार देता हूँ और वो सारी लडकियां मेरी फैन बन जाती है।" झक्की ने ये सपना मुझे उस दौर में सुनाया था जब हमारे यहाँ मोबाइल और इंटरनेट क्रांति नहीं हुई थी। उम्र कोई 13-14 साल रही होगी यानि इस सपने से हमें ये मालूम होता है कि उस वक़्त के टीनएजर कितनी मासूम सोच लिए होते थें। ख़ैर, धीरे-धीरे कर झक्की का मन ख़ेल से हटकर गांजे में लग गया। फिर नशे की आदत ऐसी लगी कि उसने मैदान में आना कम कर दिया और कुछ दिन बाद तो जैसे बंद ही कर दिया। आने वाले एक दो साल में ही पढाई में लिए हम सब दोस्तों ने एक-एक कर अपना क़स्बा छोड़ दिया और वहां से निकल गए। कभी छुट्टियों में जाते तो झक्की इधर-उधर से मिल ही जाता। उसके चेहरे पर पुरानी हंसी तो थी मगर जिस्म लगभग खोखला होते गया। मुझे लगता है कि वो ग़ज़ब का स्टैमिना और सनक किसी भी ख़ेल में उसे बहुत आगे बढ़ा सकती थीं। लेकिन वो दौर ही कुछ ऐसा था जब आदमी को अपने ही टैलेंट की ख़बर नहीं होती थी तो साला दुनिया वालों को क्या मिलती। मैं कई बरसों से झक्की से नहीं मिला हूँ और मुझे उसे लेकर कोई ताज़ा जानकारी भी नहीं। हाँ, इतना ज़रूर याद है कि वो काम करने के लिए कभी गुजरात गया था। वहां से जब वो आया तो दो-एक बार मुलाक़ात भी हुई थी। मगर एक लंबे अरसे से उसकी कोई ख़बर मालूम नहीं चली। आज भी जब झक्की को याद करता हूँ तो उसका अटैकिंग बैटिंग स्टाइल याद आ जाता है। बाड़ पर से लगाईं वो ऊँची छलांग भी याद आती है और याद आते हैं उससे जुड़े वो बहुत सारे किस्से जिन्हें हम लोग अक्सर सुनते-सुनाते हुए ख़ूब हंसा करते थें और आज भी हँसते हैं।

Comments

Popular posts from this blog

हिंदी मीडियम - पार्ट 1 (कापसे सर और उनका डर)

हिंदी मीडियम - पार्ट 2 (फाल्के सर और वो थप्पड़)