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Showing posts from December, 2010

दिलीप को दिलीप का सलाम...

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कुछ ठीक-ठीक मालूम नहीं... याद नहीं पड़ता, मगर इतना तय है कि मैं तीसरी या चौथी जमात में रहा होऊंगा। एक शाम अपने ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर कोई फिल्म देख रहा था। एक बेहद ख़ूबसूरत नौजवान... जो शराब के नशे में धुत्त किसी का नाम लिए जा रहा था... आख़िर में बड़ी तकलीफ़ के साथ उसकी सांसे उसका साथ छोड़ जाती है। 10 साल बाद उसी फिल्म को दोबारा टीवी पर देखा.... तब तक समझ जवां हो चुकी थी और कुछ मैं भी। दोस्तों वो फिल्म थी "देवदास" और वो शख़्स थे महान अदाकार दिलीप कुमार साहब। दिलीप साहब ने इतनी शिद्दत से इस किरदार को जिया की हिन्दोस्तान में हर कोई इश्क में चोट खाए, अपनी दुनिया लुटा बैठे लड़के को देखकर उसे देवदास के नाम से बुलाता। ये कमाल था दिलीप कुमार की अदाकारी का। जहां ट्रेजडी की बात हो तो आज भी बस दिलीप कुमार ही का चेहरा सामने आता है। उनका वो रुक-रुक कर बोलना। डायलॉग्स के बीच में कुछ वक्त के लिए ठहर जाना... ये सारी बाते उनके संवादों और अदाकारी को गहराई देती है। फिल्म "मधुमती" तो याद होगी आपको... वो गीत "सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं" किस तरह चेहरे पर मुस्कुराहट लिए दिल…

ख़तरनाक है देशभक्ति फिल्मों के प्रति दर्शकों की उदासीनता

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करीब 10 महीने बाद ब्लॉग लिखने बैठा हूं। आप समझिए कि बस इस कदर मजबूर हुआ कि रहा नहीं गया। बीते रविवार मुंबई में था जहां मैं आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘खेलें हम जी जान से’ देखने पहुंचा। गौरतलब है कि नौकरी छोड़ने के बाद मैने फिल्में देखना कम कर दिया है। बहुत सारे फिल्म पंडितों के विचार जानने और समीक्षाएं पढ़ने के बाद मैने फिल्म देखी। अफ़सोस केवल अजय ब्रह्मात्मज जी ने ही अपनी समीक्षा में फिल्म की प्रशंसा की। वहीं अंग्रेजी भाषा के सभी फिल्म समीक्षकों से तो आशुतोष की भरपूर आलोचना ही सुनने और देखने को मिली। फिल्म के निर्देशन, पटकथा, संवाद और लंबाई को लेकर सभी ने अपनी ज़ुबान हिला-हिला कर आशुतोष को कोसा। ये आलोचक भूल गए कि जो विषय परदे पर है वो अब से पहले अनछूआ था। जो किरदार आंखों के सामने हैं उनसे ये फिल्म पंडित खुद भी अंजान थे। क्या ये बड़ी बात नहीं कि श्रीमान गोवारिकर ने ऐसे ग़ुमनाम नायकों को सामने लाने की कोशिश की जिनसे हमारा परिचय ही नही था। सूर्ज्यो सेन का ज़िक्र इतिहास की किताबों में चार लाइनों से ज़्यादा नहीं है। बाकी के किरदार तो छोड़ ही दीजिए... क्योंकि इनसे तो सभी अनजान थे। दर्शक भी …