Skip to main content

ये नाम नहीं, पहचान है - पार्ट 6 (धोखाधड़ी)

अभी कुछ दिनों पहले की बात है जब तांत्रिक चंद्रास्वामी अचानक इस दुनिया से चलते बने। बहुत लंबे समय तक गुमनाम ज़िन्दगी जीने के बाद एक रोज़ मौत उन्हें अपने साथ ले गयी। 90 के दशक में ऐसा कोई दिन नहीं जाता था जब टीवी या अख़बार में उस शख़्स का ज़िक्र न उठा हो। उनके साथ जुड़े तमाम विवादों को किसी छलनी से छाना जाए तो एक विवाद सबसे मोटे तौर पर नज़र आता है और वो है लक्खूभाई पाठक घोटाला, जिसे उस वक़्त मीडिया में लक्खूभाई पाठक धोखाधड़ी मामला भी कहा गया।
ख़ैर ये कोई राजनितिक पोस्ट नहीं है और न ही मैं किसी विवाद पर बात कर रहा हूँ बल्कि इसी लक्खूभाई केस में छुपी है एक और दिलचस्प नाम की कहानी जो बचपन में हमारे लिए रोज़ाना के मस्ती-मज़ाक की वजह बना। मेरे क्वार्टर के बिल्कुल पीछे वाली ब्लॉक में एक लक्खू अंकल रहा करते थें। छोटे कद के, मोटे से मगर हरदम मुस्कान लिए हुए। बड़े ही अलहदा किस्म के थे लक्खू अंकल.. मस्तमौला तबीयत के मालिक, खूब खाने-पीने और हमेशा मज़ाक-मसखरी करते रहने वाले। मोहल्ले-पड़ोस में कहीं कोई उत्सव हो या सड़क से गुज़रती बरात या कोई जुलूस.. अंकल फौरन वहां पहुंचकर नाचने लगते और ऐसे मस्त होकर नाचते कि कुछ देर बाद तो बाजेवाले भी सिर्फ एक उनकी ही फरमाइश के गीतों की धुन बजाते और लक्खू अंकल दम लगाकर नाचते रहते।
अपने एक चाचा की बारात के दौरान मैं भी लक्खू अंकल के ऐसे ही जोश भरे डांस का गवाह बना था। कुछ इस क़दर नाचे थे अंकल की उन्हें न तो अपनी खुलती हुई बेल्ट का होश रह गया था न पीछे से निपकती पतलून का.. आज के लो वेस्ट फैशन से कई बरस पहले अंकल आने वाले दौर की झलक दिखा चुके थें। उस रोज़ उनके डांस की रफ़्तार देखकर तो जवान लड़के हैरान थें वहीँ हम जैसे बच्चे उनकी सरकती पैंट को देख अपने दांत निकालकर हंसने लगे। उन दिनों जब भी दूरदर्शन पर न्यूज़ आती तो लक्खूभाई पाठक धोखाघड़ी केस की अपडेट ज़रूर होती थी। उस केस से जुडी खबरें हमारे कानों में भी पड़ी और फिर क्या था "लक्खूभाई पाठक" ये नाम ज़ुबान पर कुछ ऐसा रटा कि जहाँ कहीं भी हमें मोहल्ले वाले लक्खू अंकल दिखाई दे जाते हम सब लड़के एक साथ चिल्लाने लगते "वो देखो लक्खूभाई जा रिया है... वो देखो पाठक जा रिया।" हम लोगों को उन्हें चिढ़ाने की आदत लग गई थी वो भी इस क़दर कि हम सब लड़के ख़ेल के मैदान में होते और दूर कहीं से भी लक्खू अंकल आते-जाते दिखाई पड़ते तो हम मैदान से ही चीख पड़ते "वो देख, धोखाधड़ी जा रिया है... वो देख धोखाधड़ी आ रिया है.. ओये धोखाधड़ी.." जी हां, पहले लक्खूभाई.. फिर पाठक और फिर उससे भी छोटा करते हुए हमने अंकल का नाम धोखाधड़ी ही रख दिया। उसे बोलने में आसानी थी और बोलकर हंसना तो और भी आसान हो गया था। ज़ाहिर तौर पर ये सरासर बदतमीज़ी थी और इसे मासूम बचपना तो नहीं कहा जा सकता मगर बड़ी बात ये थी कि अपने नाम के साथ इस तरह खिलवाड़ करने वाले हम बच्चों को हँसता देखकर लक्खू अंकल भी दिल से मुस्कुराते और ख़ूब खिलखिलाते।
जंगलों के किनारे पनपा हमारा बचपन भी कुछ जंगली था लेकिन जिन लोगों की आँखों के आगे हम बड़े हुए वो लोग बड़े दिलवाले थें और बड़े हिम्मतवाले भी😂 सीएमपीडीआई के साथ अपनी नौकरी ख़त्म कर अंकल रिटायर हुए और फिर अपने गांव जाकर बस गए। लक्खू अंकल की तरह ही बहुत से लोग थे जिन्हें सुबह से लेकर शाम तक देखने की आदत थीं हमारी आँखों को लेकिन वक़्त के साथ-साथ ऐसे लोग दूर होते गए। हम जानते हैं कि ज़िन्दगी में अब दोबारा कभी वैसे लोग और वैसा दौर नहीं लौटने वाला.. लेकिन क़स्बाई परवरिश का असली मज़ा यही है कि यादों में ही सही मगर हम अपनी पसंद के किरदारों को बार-बार रिवर्स-फॉरवर्ड करके देख सकते हैं। (“ये नाम नहीं, पहचान है” इस संस्मरण की सीरिज में कुछ अजीब-ओ-ग़रीब नामों पर बातें करेंगे। आपको भी कुछ नाम याद आएं तो ज़रूर शेयर करें… शुक्रिया)

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

हिंदी मीडियम - पार्ट 2 (फाल्के सर और वो थप्पड़)

पैंतीस-चालीस या उससे भी कुछ ज़्यादा बच्चों से भरी हुई क्लास.. उनमें से हर एक की गोद में खुली हुई इंग्लिश की बुक और उसका लेसन नंबर 3 या 4... वही जॉन, डेविड, राम और लीला टाइप किरदारों के बहाने अंग्रेजी के बेहद घिसे हुए और उबाऊ वाक्यों का पाठ... कुछ बच्चे सामने लोहे की फोल्डिंग कुर्सी पर बैठे फाल्के सर की तरफ गौर से देख रहे हैं और कुछ अपनी क़िताब में दो आंखें गढ़ाए फिरंगियों की ज़ुबान के अजीब उच्चारण और उन शब्दों की स्पेलिंग को समझने की कोशिश कर रहे हैं.. इधर मेरे बाएं कान में खुजली मची हुई है और मैं अपने नए खरीदे हुए रेनॉल्ड्स पैन के नीले ढक्कन से खुजली शांत कर रहा हूँ... क्लास के बाहर नज़र दौड़ाने पर मैं वही रोज़ जैसा माहौल पाता हूँ... स्कूल के साथ वाले नाले में बेशरम के पौधे फिर तेज़ी से बढ़ने लगे हैं.. उन पर हल्क़े नीले रंग के मगर फिर भी बदसूरत से फूल झूल रहे हैं.. कई बार इसी बेशरम की हरी डंडियों से मास्साब हमारी हथेलियां और पुट्ठे लाल कर चुके हैं.. सच तो यह कि मुझे इस हरी कच्च बेशरम से बेहद कोफ़्त होती है.. (क्रिकेट खेलते हुए हमारी कितनी ही गेंदें उस बेशरम के नीचे जमे गंदे बदबूदार कीचड मे...

ख़तरनाक है देशभक्ति फिल्मों के प्रति दर्शकों की उदासीनता

करीब 10 महीने बाद ब्लॉग लिखने बैठा हूं। आप समझिए कि बस इस कदर मजबूर हुआ कि रहा नहीं गया। बीते रविवार मुंबई में था जहां मैं आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘खेलें हम जी जान से’ देखने पहुंचा। गौरतलब है कि नौकरी छोड़ने के बाद मैने फिल्में देखना कम कर दिया है। बहुत सारे फिल्म पंडितों के विचार जानने और समीक्षाएं पढ़ने के बाद मैने फिल्म देखी। अफ़सोस केवल अजय ब्रह्मात्मज जी ने ही अपनी समीक्षा में फिल्म की प्रशंसा की। वहीं अंग्रेजी भाषा के सभी फिल्म समीक्षकों से तो आशुतोष की भरपूर आलोचना ही सुनने और देखने को मिली। फिल्म के निर्देशन, पटकथा, संवाद और लंबाई को लेकर सभी ने अपनी ज़ुबान हिला-हिला कर आशुतोष को कोसा। ये आलोचक भूल गए कि जो विषय परदे पर है वो अब से पहले अनछूआ था। जो किरदार आंखों के सामने हैं उनसे ये फिल्म पंडित खुद भी अंजान थे। क्या ये बड़ी बात नहीं कि श्रीमान गोवारिकर ने ऐसे ग़ुमनाम नायकों को सामने लाने की कोशिश की जिनसे हमारा परिचय ही नही था। सूर्ज्यो सेन का ज़िक्र इतिहास की किताबों में चार लाइनों से ज़्यादा नहीं है। बाकी के किरदार तो छोड़ ही दीजिए... क्योंकि इनसे तो सभी अनजान थे। दर्शक भी इ...

ये नाम नहीं, पहचान है - पार्ट 3 (सक़लैन का कमाल है..)

नमस्कार भाई लोगों.. क्या हाल है? ये नाम नहीं, पहचान है सीरीज का पिछला पार्ट मैंने एक साल पहले लिखा था। कुछ किस्से लगातार लिखने के बाद अचानक मैंने लिखना बंद कर दिया। वजह बस इतनी सी थी कि जॉब करते हुए कुछ अलग लिखने का टाइम ही नहीं मिल पाता। यादों को पन्नों पर उतारने में भी काफी वक़्त ख़र्च होता है और जिस तरह की ज़िन्दगी हम जी रहे हैं उसमें इतना वक़्त निकाल पाना बहुत मुश्किल है। काफी कोशिश के बाद दोबारा कीबोर्ड पर उंगलियां चला रहा हूँ तो चलिए एक पुराने किरदार की बात करते हैं जो हमारे बचपन से जुड़ा हुआ है। फरवरी के महीने में बाबू (राजेश सरदार) शोभापुर आया हुआ था और काफी अर्से के बाद उससे मुलाकात हुई थी। किसी काम के सिलसिले में बाबू को पाथाखेड़ा जाना था और उसके साथ साथ मैं भी चल पड़ा। रास्ते में हॉस्पिटल तिराहे से पहले में हमें वो शख़्स नज़र आया जो कि हमारे बचपन की सबसे मजेदार यादों का हिस्सा है। अब जबकि चैंपियंस ट्रॉफी कुछ ही दिनों की दूरी पर है और 4 जून को हमें पाकिस्तान से भिड़ना है.. तो क्यों न उसी शख़्स की बात करें जिसे हम सब सक़लैन कहते है। सक़लैन भाईजान का असली नाम मुझे याद नहीं रहा है लेक...