Skip to main content

ख़तरनाक है देशभक्ति फिल्मों के प्रति दर्शकों की उदासीनता


करीब 10 महीने बाद ब्लॉग लिखने बैठा हूं। आप समझिए कि बस इस कदर मजबूर हुआ कि रहा नहीं गया। बीते रविवार मुंबई में था जहां मैं आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘खेलें हम जी जान से’ देखने पहुंचा। गौरतलब है कि नौकरी छोड़ने के बाद मैने फिल्में देखना कम कर दिया है। बहुत सारे फिल्म पंडितों के विचार जानने और समीक्षाएं पढ़ने के बाद मैने फिल्म देखी। अफ़सोस केवल अजय ब्रह्मात्मज जी ने ही अपनी समीक्षा में फिल्म की प्रशंसा की। वहीं अंग्रेजी भाषा के सभी फिल्म समीक्षकों से तो आशुतोष की भरपूर आलोचना ही सुनने और देखने को मिली। फिल्म के निर्देशन, पटकथा, संवाद और लंबाई को लेकर सभी ने अपनी ज़ुबान हिला-हिला कर आशुतोष को कोसा। ये आलोचक भूल गए कि जो विषय परदे पर है वो अब से पहले अनछूआ था। जो किरदार आंखों के सामने हैं उनसे ये फिल्म पंडित खुद भी अंजान थे। क्या ये बड़ी बात नहीं कि श्रीमान गोवारिकर ने ऐसे ग़ुमनाम नायकों को सामने लाने की कोशिश की जिनसे हमारा परिचय ही नही था। सूर्ज्यो सेन का ज़िक्र इतिहास की किताबों में चार लाइनों से ज़्यादा नहीं है। बाकी के किरदार तो छोड़ ही दीजिए... क्योंकि इनसे तो सभी अनजान थे। दर्शक भी इन तथाकथित फिल्म पंडितों की सुनकर इस अच्छी फिल्म के प्रति उदासीन बने रहे। समझ नहीं आता यही दर्शक ‘ओम शांति ओम’ और ‘हे बेबी’ जैसी फिल्मों के समय समीक्षकों की क्यूं नहीं सुनते? ख़ैर न तो ‘खेलें हम जी जान से’ की लंबाई कहीं ख़लल डालती है और न ही इसका निर्देशन कमज़ोर है। पटकथा और संवाद भी कम से कम ख़राब तो नहीं कहे जा सकते। जो समीक्षक ऐसा सोचते है उन्हें थोड़ा आराम कर दोबारा भारतीय इतिहास और हिंदी सिनेमा को समझने की कोशिश करनी चाहिए। दुख तो तब होता है जब राजीव मसंद जैसे समीक्षक आशुतोष की आलोचना करते है। मसंद को चाहिए की वो हर हिंदी फिल्म को अमेरिकन फिल्मों के साथ रखकर ना तौलें। ख़ासकर जब बात देशप्रेम की हो। ऐसी फिल्मों से दर्शकों को दूर रखना हमारी कम समझ और दिमाग़ के खोख़लेपन को ही दर्शाता है। क्या फिल्म तकनीकि रुप से धमाल हो, ख़ूब मनोरंजक हो या फिर कलात्मक हो तभी देखने लायक होती है? मै तो ऐसा नहीं मानता। कुछ फिल्में केवल देखने के लिए होती है क्योंकि इनमें आपके जानने लायक बहुत कुछ होता है। ‘खेले हम जी जान से’ ऐसी ही फिल्मों में रखी जा सकती है। कौन भारतीय होगा जो सूर्ज्यो सेन को परदे पर देखकर ख़ुश न हुआ हो। छोटे-छोटे बच्चों को देश पर कुर्बान होते देख कौन विचलित न हुआ होगा। परदे पर उतारा गया चट्टोग्राम का ये विद्रोह किसकी नसों में खून का उबाल तेज़ नहीं कर देगा। और अगर ऐसा नहीं हुआ है तो ये निर्देशक की ग़लती नहीं है। शायद हमारा ख़ून ठंडा होते जा रहा है। हो सकता है कि अंग्रेज बनते जा रहे हम लोगों के लिए अब अंग्रेजों द्वारा बरसो पहले ढाए गए ज़ुल्मों की कहानियां पुरानी पड़ चुकी है। मेरे हिसाब से आशुतोष ने एक शानदार थ्रिलर रचा है। जिसमें देशप्रेम की भावना के साथ-साथ बहुत कुछ नया देखने और जानने को मिला है। फिल्म के संगीत को भी कई लोगों ने कमज़ोर कहा है... साहब ज़रा एक मिनट रुक कर फिल्म का गीत ‘ये देश है मेरा’ सुनिये फिर कुछ बोलिए। टाइटल ट्रेक ‘खेलें हम जी जान से’ और ‘वंदे मातरम’ भी सुनने लायक है। अफ़सोस तमाम म्यूज़िक चैनल्स ‘शीला की जवानी’ में इन बेहद ख़ूबसूरत गीतों को नज़रअंदाज़ कर गए। क्या कहिए ऐसे लोगों को जिनकी समझ कौड़ियों की भी नहीं। ख़ैर अगर आपने ये फिल्म नहीं देखी है तो अब ज़रूर देखिए... लेकिन हां सिर्फ़ मज़े के लिए मत जाइयेगा। अगर ऐसा है तो फिर इसके लिए शीला की जवानी का ही रुख़ करिएगा।

Comments

  1. आपकी बात से यह स्‍पष्‍ट है कि फिल्‍म देशभक्‍त नौजवानों पर केन्द्रित है। अब आप ही बताइए, इस देश में यदि देशभक्ति बढ़ जाएगी तो व्‍यापार कैसे चलेगा? इसलिए ऐसी फिल्‍मों को खारिज करो और मुन्‍नी बाई और शीला के जलवे चलने दो। क्‍योंकि मीडिया ने तो ठेका ले रखा है इस देश को धरातल में ले जाने का। इन्‍हें माफ कर दो भाई, क्‍योंकि इन्‍हें पता नहीं कि ये क्‍या कर रहे हैं?

    ReplyDelete
  2. sheela our munni ka jamaanaa aa gayaa hai...kyaa kiyaa jaaye....aapse sahamat hun.

    ReplyDelete
  3. दिलीप साहब, बड़ा घालमेल हुआ पड़ा है इन दिनों। चारों तरफ़ से इतना कुछ नकारात्मक सुनने को मिल रहा है कि सकारात्मक की ख़्वाहिशें तक कहीं कोने में दुबकी पड़ी है। आप तो बेहतर जानते है ना, फ़िल्में समाज का आईना होती हैं... समाज किस दिशा को चल रहा है? भ्रष्टाचार, गंदगी, हर ओर गिरता स्तर, यही कुछ तो हासिल रह गया है। लिहाज़ा, हम अच्छा देखना और सुनना भी नहीं चाहते।
    फ़िक्र मत करिए, फ़िल्म दर्शकों के जिस वर्ग के लिए बनी है, उन्होंने तो ख़ूब सराही। चंद फ़िल्म समीक्षक ये थोड़े ही ना तय करेंगे कि हमें क्या देखना है और क्या नहीं? करने दीजिए उन्हें बुराई।।
    काफ़ी दिनों बाद लिखा आपने, अच्छा लगा। शुभकामनाएं।।

    ReplyDelete
  4. आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया... अगर आपको लेख पसंद आया हो तो ये फिल्म ज़रूर जाकर देखें।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

हिंदी मीडियम - पार्ट 2 (फाल्के सर और वो थप्पड़)

पैंतीस-चालीस या उससे भी कुछ ज़्यादा बच्चों से भरी हुई क्लास.. उनमें से हर एक की गोद में खुली हुई इंग्लिश की बुक और उसका लेसन नंबर 3 या 4... वही जॉन, डेविड, राम और लीला टाइप किरदारों के बहाने अंग्रेजी के बेहद घिसे हुए और उबाऊ वाक्यों का पाठ... कुछ बच्चे सामने लोहे की फोल्डिंग कुर्सी पर बैठे फाल्के सर की तरफ गौर से देख रहे हैं और कुछ अपनी क़िताब में दो आंखें गढ़ाए फिरंगियों की ज़ुबान के अजीब उच्चारण और उन शब्दों की स्पेलिंग को समझने की कोशिश कर रहे हैं.. इधर मेरे बाएं कान में खुजली मची हुई है और मैं अपने नए खरीदे हुए रेनॉल्ड्स पैन के नीले ढक्कन से खुजली शांत कर रहा हूँ... क्लास के बाहर नज़र दौड़ाने पर मैं वही रोज़ जैसा माहौल पाता हूँ... स्कूल के साथ वाले नाले में बेशरम के पौधे फिर तेज़ी से बढ़ने लगे हैं.. उन पर हल्क़े नीले रंग के मगर फिर भी बदसूरत से फूल झूल रहे हैं.. कई बार इसी बेशरम की हरी डंडियों से मास्साब हमारी हथेलियां और पुट्ठे लाल कर चुके हैं.. सच तो यह कि मुझे इस हरी कच्च बेशरम से बेहद कोफ़्त होती है.. (क्रिकेट खेलते हुए हमारी कितनी ही गेंदें उस बेशरम के नीचे जमे गंदे बदबूदार कीचड मे...

ये नाम नहीं, पहचान है - पार्ट 3 (सक़लैन का कमाल है..)

नमस्कार भाई लोगों.. क्या हाल है? ये नाम नहीं, पहचान है सीरीज का पिछला पार्ट मैंने एक साल पहले लिखा था। कुछ किस्से लगातार लिखने के बाद अचानक मैंने लिखना बंद कर दिया। वजह बस इतनी सी थी कि जॉब करते हुए कुछ अलग लिखने का टाइम ही नहीं मिल पाता। यादों को पन्नों पर उतारने में भी काफी वक़्त ख़र्च होता है और जिस तरह की ज़िन्दगी हम जी रहे हैं उसमें इतना वक़्त निकाल पाना बहुत मुश्किल है। काफी कोशिश के बाद दोबारा कीबोर्ड पर उंगलियां चला रहा हूँ तो चलिए एक पुराने किरदार की बात करते हैं जो हमारे बचपन से जुड़ा हुआ है। फरवरी के महीने में बाबू (राजेश सरदार) शोभापुर आया हुआ था और काफी अर्से के बाद उससे मुलाकात हुई थी। किसी काम के सिलसिले में बाबू को पाथाखेड़ा जाना था और उसके साथ साथ मैं भी चल पड़ा। रास्ते में हॉस्पिटल तिराहे से पहले में हमें वो शख़्स नज़र आया जो कि हमारे बचपन की सबसे मजेदार यादों का हिस्सा है। अब जबकि चैंपियंस ट्रॉफी कुछ ही दिनों की दूरी पर है और 4 जून को हमें पाकिस्तान से भिड़ना है.. तो क्यों न उसी शख़्स की बात करें जिसे हम सब सक़लैन कहते है। सक़लैन भाईजान का असली नाम मुझे याद नहीं रहा है लेक...