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ये नाम नहीं, पहचान है - पार्ट 5 (नमस्ते बॉलर...)

हमारे भारत देश में अभिवादन एक का बड़ा सिंपल सा तरीका है.. अपने दोनों हाथ जोड़कर हल्क़े से मुस्कुराते हुए कहना.. नमस्ते! जब कोई रिश्तेदार घर पर आये तो सामने आते ही शुरू हो जाना.. नमस्ते चाचाजी.. नमस्ते मामाजी.. नमस्ते फूफाजी और चाहे जितने भी जी आते जाए, उनके सामने बस एक नमस्ते लगाइए और सर झुकाते जाइये। अगर आप बच्चे हैं और ऐसे ही नमस्ते के साथ रिश्तेदारों के साथ पेश आते हैं तो फिर आप सभ्य और शरीफ बच्चों में गिने जाएंगे। बड़ा कमाल शब्द है नमस्ते.. और तो और सरकारी दफ़्तरों में बैठे बाबू लोगों को नमस्ते ठीक तरह से बजा दिया जाए तो समझिए की उन्हें देने वाली चाय-पानी में भी डिस्काउंट मिल जाता है।खैर, नमस्ते अंकलजी और नमस्ते बाबूजी तक तो ठीक है लेकिन आज मैं आपको एक ऐसे नमस्ते का किस्सा सुना रहा हूँ जिसके आगे लगता था बॉलर.. जी हां, उस शख़्स को लोग कहते थें नमस्ते बॉलर..
नमस्ते बॉलर का असली नाम था संजय यादव और उसे हम बचपन में चिढ़ाने के लिए अक्सर बिहारी भी बुलाया करते थें। संजय का बॉलिंग करने का बड़ा ही दिलचस्प अंदाज़ था.. बहुत छोटा सा रन-अप लेते हुए जब वो गेंद फेंकने वाला होता तो विकेट के पास पहुँचते ही ज़ोर से उछलता और इसी दौरान उसके दोनों हाथ ऊपर जाते और फिर हवा में दायीं और बायीं हथेलियां कुछ इस तरह से मिलती जैसे कोई किसी को नमस्ते कर रहा हो। उसका बॉलिंग एक्शन अजीब तो था, मगर बहुत मजेदार भी था और जब तक संजय भाई का ओवर चलता, उनकी हर एक गेंद पर मैदान में मौजूद हम सब लोग चिल्लाने लगते "ओए! नमस्ते बॉलर.." जवाब में वो भी मुस्कुरा देता। हम अक्सर मज़ाक में कहा करते कि बैट्समैन किसी अच्छे बॉलर की गेंद को बल्ले से रोककर उसे सम्मान देता है जबकि संजय के सामने तो बैट्समैन कैसा भी हो वो गेंद फेंकने से पहले उसे दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते करता है। उसके एक्शन की मेरे पास कोई तस्वीर नहीं है अगर होती तो आपको भी मालूम होता कि कितना ड्रामेटिक बॉलिंग एक्शन था उसका। अगर कभी संजय भाई से मुलाक़ात हुई तो ज़रूर उस एक्शन में एक तस्वीर क्लिक करूंगा। संजय भाई को अपने ओवर की 6 गेंदों में ही अच्छी ख़ासी हूटिंग सहनी पड़ जाती थी और वो भी अपनी ही टीम के लड़कों से.. ऐसे में सामने वाली टीम की चिल्ला-चोट को तो भूल ही जाइये वो तो अपनी टीम से ही बच जाए बहुत होता था। मुझे एक बहुत पुराना मैच अभी तक याद है और वो भी संजय भाई की बॉलिंग की वजह से.. हुआ कुछ यूँ था कि सामने वाली टीम के ज़्यादातर बैट्समैन आउट हो चुके थे और उसी बीच हमारे कप्तान राजेश ने एक ओवर फेंकने के लिए संजय को बॉल थमाई। किसी भी मैच में संजय से कुछ ओवर्स डलवाये जाते थें मगर उस रोज़ का वो ओवर हमारे लिए एक मुसीबत बन गया और खुद उसकी बॉलिंग एक मज़ाक.. संजय जैसे ही बॉल फेंकने के लिए बढ़ा लोग कहने लगे "नमस्ते बॉलर.. ओए नमस्ते बॉलर.." और तभी उसके हाथ से बॉल छूटी और वाइड चली गयी। इसी तरह जब संजय दूसरी बॉल फेंकने आया तो फिर वैसा ही हुआ। इसी तरह तीसरी और चौथी बॉल भी वाइड चली गयी.. संजय एक के बाद एक वाइड बॉल फेंकते ही जा रहा था। यहाँ तक कि उसकी वो हालत देखकर हम लोगों ने हूटिंग करनी भी छोड़ दी, लेकिन संजय की बॉल सही टप्पे पर पड़ने का नाम ही न लेती। इस तरह संजय ने 22 वाइड और 6 फेयर बॉल के साथ उस ओवर में 28 गेंदें फेंकी थी.. 28 गेंदें यानी 28 बार नमस्ते😂
15 ओवर के किसी मैच में 22 वाइड रन मायने रखते हैं और उसी वजह से हमारे सामने अच्छा ख़ासा टोटल रख दिया गया था। उस मैच को मैं एक और वजह से याद करता हूँ और वो था कलावती बाई यानी शैलेष के टोटकों के लिए.. शिव और मैं मैदान के बाहर शैलेष के साथ बैठे हुए इनिंग का स्कोर काउंट कर रहे थें। उसी वक़्त शैलेष अपनी जगह से उठा और बोला कि देखो अब तुम्हारा बैट्समैन आउट होगा और वो दूर पेशाब करने चला गया। उसके वापिस आते ही सच में पहला विकेट गिर गया.. मैं उसे दो-चार गाली दी और फिर अपने काम में लग गया। थोड़ी देर के बाद वो फिर से उठा और हँसते हुए पेड़ के नीचे जाकर धार मारने लगा.. जब वो वापस आया तो हमारा एक और विकेट गिर गया। इस बार शिव और मैं मिलकर उसे गाली देने लगे... भाई यकीन मानों उस रोज़
शैलेष ने सिर्फ मूत-मूतकर ही हमारे 4-5 बैट्समैन आउट करवा दिए थें😂
हम वो मैच हार गए थें और उसके बाद के कई हफ़्तों तक संजय को उस एक ओवर के लिए ताने मारते रहे। संजय ने कभी उस बात का बुरा नहीं माना और अपनी आदत के मुताबिक़ हमेशा हंस दिया करता। अपने मोहल्ले के और दोस्तों की तरह ही मैंने संजय के साथ भी बहुत सारा और अच्छा वक़्त गुज़ारा है। बहुत सारी यादें है.. सरकारी स्कूल की बालकनी में फुटबॉल खेलना, मोहल्ले से दूर निकलकर छुप-छुपकर सिगरेट पीना, घंटों तक क्रिकेट खेलने के बाद भी शाम को बिजली कटौती के दौरान क़स्बे भर में घूमना और ख़ूब गप्प मारना। दशक भर से भी ज़्यादा वक़्त हो गया है संजय भाई से मुलाक़ात नहीं हो सकी है। दिल्ली में कई साल रहने के बाद भी मेरा कभी रेवाड़ी जाना नहीं हुआ जहाँ वो लंबे समय तक रहा। संजय के छोटे भाई से मालूम चला है कि इन दिनों संजय भाई दिल्ली में हैं लेकिन अफ़सोस कि अब मैं दिल्ली में नहीं रहता। लेकिन अच्छी बात ये है कि इस ब्लॉग के लिखे जाने तक मेरे पास संजय का नया मोबाइल नंबर आ चुका है और संभवतः अगली दिल्ली यात्रा में उससे मुलाकात भी होगी और इसी बहाने उस फेमस बॉलिंग एक्शन की एक तस्वीर भी उतारी जायेगी।

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